कांग्रेस नेता राहुल गांधी की राजनीति में इन दिनों सड़क पर उतरकर अचानक विरोध प्रदर्शन करने का अंदाज चर्चा में है। बिना लंबी तैयारी सार्वजनिक किए अचानक किसी जगह पहुंचना, छोटा समूह जुटाना और मौके पर ही विरोध शुरू कर देना उनकी हालिया रणनीति का हिस्सा नजर आ रहा है।
राहुल गांधी के हालिया प्रदर्शनों में एक बात खास तौर पर देखने को मिली है। पहले से बड़े स्तर पर कार्यक्रम की जानकारी देने के बजाय अचानक किसी जगह पहुंचकर विरोध शुरू किया गया। इससे प्रशासन और पुलिस को भी मौके के हिसाब से प्रतिक्रिया देनी पड़ी।
जंतर-मंतर के हालिया प्रदर्शन में भी विपक्षी सांसद पहले एक बैठक में जुटे और इसके बाद बसों से अचानक प्रदर्शन स्थल की ओर रवाना हुए।
7 अक्टूबर को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और विपक्षी सांसद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर की ओर बढ़े। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर से पहले ही रोक दिया और कई नेताओं को हिरासत में लिया।
राहुल गांधी ने इस दौरान चुनाव आयोग और सरकार पर गंभीर आरोप लगाए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई। हालांकि चुनाव आयोग और बीजेपी विपक्ष के लगाए आरोपों को खारिज करते रहे हैं।
राहुल गांधी की इस शैली को राजनीतिक विश्लेषण में ‘गुरिल्ला राजनीति’ कहा जा रहा है। इसका मतलब ऐसी राजनीतिक कार्रवाई से है जिसमें बड़े कार्यक्रम के बजाय अचानक और सीमित संख्या में लोगों के साथ विरोध दर्ज कराया जाए।
इस रणनीति का मकसद सड़क पर राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाना और विरोध को तुरंत सुर्खियों में लाना माना जा रहा है।
राहुल गांधी के राजनीतिक सफर में अचानक जमीन पर पहुंचने और सीधे लोगों से जुड़ने की रणनीति नई नहीं है। भट्टा-पारसौल आंदोलन के दौरान भी वह अचानक किसानों के बीच पहुंचे थे। हाल के प्रदर्शनों में इसी तरह की सक्रियता को नए तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है।
कांग्रेस लंबे समय से संसद के बाहर भी सरकार को सीधे चुनौती देने की रणनीति पर जोर दे रही है। राहुल गांधी के अचानक प्रदर्शनों से पार्टी को मीडिया और राजनीतिक चर्चा में जगह मिल रही है, लेकिन दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन के भीतर समन्वय को लेकर भी सवाल उठे हैं।
अब देखना होगा कि यह आक्रामक और अचानक विरोध वाली रणनीति आने वाले दिनों में कांग्रेस की राजनीति को कितना मजबूत करती है और सरकार पर इसका कितना राजनीतिक दबाव बनता है।