लखनऊ: राजधानी लखनऊ के कुकरैल वन क्षेत्र में प्रस्तावित नाइट सफारी परियोजना एक बार फिर कानूनी सवालों के घेरे में आ गई है। पर्यावरणविद् आलोक सिंह ने सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति यानी CEC के सामने आपत्ति दर्ज कराते हुए परियोजना के लिए नए सिरे से योजना, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी DPR और जरूरी वैधानिक मंजूरियां लेने की मांग की है। उनका तर्क है कि जिस मूल परियोजना को मंजूरियों के लिए पेश किया गया था, उसका स्वरूप अब काफी बदल चुका है।
कुकरैल नाइट सफारी की शुरुआती योजना सिर्फ नाइट सफारी तक सीमित नहीं थी। इसमें लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान को स्थानांतरित करना, चार लेन की सड़क और एक एडवेंचर जोन भी शामिल था।
हालांकि, CEC की सिफारिशों के बाद इन तीनों हिस्सों को परियोजना से बाहर कर दिया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इन फैसलों को स्वीकार किया और सुप्रीम कोर्ट के 15 जुलाई 2026 के आदेश में भी इसका उल्लेख हुआ।
पर्यावरणविद् आलोक सिंह का कहना है कि मूल परियोजना में नाइट सफारी और चिड़ियाघर से जुड़ी कई सुविधाएं साझा थीं। अब जब चिड़ियाघर स्थानांतरण, सड़क और एडवेंचर जोन वाले हिस्से हट गए हैं, तो परियोजना का स्वरूप बदल गया है।
इसी आधार पर उन्होंने मांग की है कि केवल नाइट सफारी के लिए नई DPR, नया मास्टर प्लान और नए सिरे से आवश्यक मंजूरियां ली जाएं।
अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, पर्यावरणविद् ने परियोजना के लिए मंजूर वित्तीय राशि और जमीन के आवंटन की भी समीक्षा की मांग की है। उनके अनुसार मूल परियोजना के लिए 3510.57 करोड़ रुपये की वित्तीय मंजूरी में अब हटाए जा चुके सड़क प्रोजेक्ट का खर्च भी शामिल था।
उनका कहना है कि परियोजना का स्वरूप बदलने के बाद जमीन की जरूरत और कुल लागत का भी नए सिरे से आकलन किया जाना चाहिए।
कुकरैल क्षेत्र अधिसूचित रिजर्व फॉरेस्ट है। पर्यावरणविद् ने केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण यानी CZA की 2025 की नाइट सफारी गाइडलाइन का हवाला देते हुए परियोजना की वैधानिक स्थिति पर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने पर्यावरण मंजूरी के लिए जमा किए गए दस्तावेजों में भी कुछ विसंगतियां होने का दावा किया है। ये सभी आपत्तियां फिलहाल उनके द्वारा CEC के सामने रखी गई हैं और इन पर आगे संबंधित प्रक्रिया के तहत विचार होना है।
कुकरैल नाइट सफारी परियोजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 15 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश सरकार को आगे बढ़ने की अनुमति दी थी। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यह अनुमति केवल उस पूर्व न्यायिक आदेश के तहत आवश्यक अनुमति तक सीमित है और इससे अन्य कानूनों के तहत जरूरी वैधानिक मंजूरियां खत्म नहीं होतीं।
सुप्रीम कोर्ट ने CEC की सिफारिशों और निर्धारित पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों का पालन करने की शर्त भी रखी थी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार परियोजना को CEC की रिपोर्ट में बताए गए सुरक्षा उपायों और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण तथा पर्यावरण मंत्रालय से जुड़ी शर्तों का पालन करना होगा।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जिस काम के लिए अलग से वैधानिक मंजूरी जरूरी है, उसे संबंधित मंजूरी मिलने से पहले शुरू नहीं किया जा सकता। CEC को परियोजना स्थल का समय-समय पर निरीक्षण करने और अनुपालन की स्थिति देखने की जिम्मेदारी भी दी गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने CEC को पहला साइट निरीक्षण 28 अक्टूबर 2026 तक करने और इसके बाद स्थिति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।
उत्तर प्रदेश सरकार को भी निरीक्षण के दौरान CEC को जरूरी दस्तावेज, रिकॉर्ड और अन्य जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया है।
अब मुख्य सवाल यह है कि कुकरैल नाइट सफारी के बदले हुए स्वरूप के लिए क्या नए सिरे से DPR और अन्य मंजूरियों की जरूरत पड़ेगी। पर्यावरणविद् की ओर से CEC के सामने यही मांग रखी गई है।
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट की जुलाई की अनुमति के तहत परियोजना को निर्धारित शर्तों और सभी लागू वैधानिक मंजूरियों के साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। इसलिए आने वाले समय में CEC की जांच और संबंधित प्राधिकरणों के फैसले महत्वपूर्ण रहेंगे।
फिलहाल कुकरैल नाइट सफारी परियोजना को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट की शर्तों, CEC की निगरानी और नई आपत्तियों के बीच आगे बढ़ रहा है। परियोजना के अंतिम स्वरूप और निर्माण से जुड़े अगले कदम संबंधित मंजूरियों और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेंगे।