भारत और चीन के बीच राजनीतिक रिश्तों में उतार-चढ़ाव के बावजूद दोनों देशों के बीच कारोबारी निर्भरता कम होने के बजाय बढ़ती गई है। चीन से बड़े पैमाने पर सामान आने के कारण भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ा और अब यह करीब 112 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच गया है।
भारत के खिलौना बाजार में एक समय चीन की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी तक थी। इसके बाद भारत ने विदेशी खिलौनों पर आयात शुल्क बढ़ाया और गुणवत्ता से जुड़े नियम भी सख्त किए।
इसका असर भी दिखाई दिया। 2020 के आसपास भारत में खिलौनों का आयात करीब 30 करोड़ डॉलर था, जो घटकर करीब 10 करोड़ डॉलर रह गया। वहीं भारत से खिलौनों का निर्यात बढ़कर करीब 20 करोड़ डॉलर हो गया।
खिलौना उद्योग में भारत ने चीन पर निर्भरता कम करने में कुछ सफलता हासिल की, लेकिन दूसरे कई क्षेत्रों में तस्वीर अलग है। मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर सोलर पैनल, मशीनरी, केमिकल और कई औद्योगिक उत्पादों के लिए भारत अब भी चीन से बड़े पैमाने पर आयात करता है।
2020 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 44 अरब डॉलर था। कुछ ही वर्षों में यह बढ़कर करीब 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ा। भारत ने कई चीनी ऐप पर प्रतिबंध लगाए और कुछ उत्पादों पर एंटी-डंपिंग शुल्क भी लगाया।
इसके बावजूद चीन से होने वाला आयात लगातार बढ़ता रहा। खास बात यह रही कि इसी अवधि में चीन को भारत का निर्यात महामारी से पहले के स्तर से भी नीचे रहा, जबकि चीन से भारत का आयात काफी बढ़ गया।
चीन के पास बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की क्षमता, मजबूत सप्लाई चेन और कई क्षेत्रों में कम लागत पर सामान तैयार करने का फायदा है। भारत के कई उद्योगों के लिए चीनी मशीनरी, कच्चा माल और कंपोनेंट्स अभी भी सस्ते और आसानी से उपलब्ध विकल्प हैं।
यही वजह है कि केवल आयात शुल्क बढ़ाने से इस निर्भरता को पूरी तरह खत्म करना मुश्किल है।
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को चीन से आयात कम करने के लिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत करना होगा। इसके लिए सस्ती बिजली, आसान और कम लागत वाला कर्ज, बेहतर लॉजिस्टिक्स और स्थिर कारोबारी नीतियों की जरूरत होगी।
सिर्फ चीन से सामान खरीदना कम करना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को ऐसे उत्पाद तैयार करने होंगे जो घरेलू जरूरत पूरी करने के साथ-साथ दुनिया के दूसरे बाजारों में भी प्रतिस्पर्धा कर सकें।
भारत में चीनी कंपनियों के निवेश को लेकर भी सावधानी की जरूरत बताई जा रही है। अगर किसी निवेश से सिर्फ चीन से आने वाले पार्ट्स को भारत में जोड़कर उत्पाद बेचने का कारोबार बढ़ता है, तो इससे स्थानीय उत्पादन मजबूत होने के बजाय आयात पर निर्भरता और बढ़ सकती है।
इसके विपरीत ऐसी तकनीक और निवेश को प्राथमिकता देने की जरूरत होगी जिससे भारत में वास्तविक उत्पादन, कंपोनेंट निर्माण और निर्यात बढ़े।
भारत के लिए चीन के साथ व्यापार घाटे को कम करना आसान नहीं होगा। कुछ क्षेत्रों, जैसे दवा उद्योग, में भारतीय कंपनियों के लिए चीन के बाजार में निर्यात बढ़ाने के अवसर हो सकते हैं। लेकिन केवल कुछ चुनिंदा उत्पादों का निर्यात बढ़ाकर इतने बड़े व्यापार घाटे को खत्म करना संभव नहीं माना जा रहा।
असल चुनौती यही है कि भारत चीन से होने वाले जरूरी आयात को धीरे-धीरे कम करे और साथ ही अपने उत्पादों के लिए चीनी बाजार में बेहतर पहुंच हासिल करे।