मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्षी दल और सामाजिक संगठन चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं। इसी बीच 42 पूर्व न्यायाधीशों ने खुला पत्र जारी कर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिशों पर चिंता जताई है। इस मुद्दे पर देश में राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है।
विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने की आशंका है। इसी को लेकर विपक्ष मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है।
6 अक्टूबर से दिल्ली में विपक्षी सांसदों ने चुनाव आयोग के कार्यालय की ओर मार्च करने की कोशिश की। इसके बाद जंतर-मंतर जाने से रोके जाने और पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी विवाद हुआ। 8 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों ने महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पहुंचकर अपना विरोध दर्ज कराया।
दूसरी ओर, 42 पूर्व न्यायाधीशों ने खुले पत्र में चुनाव आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ बिना ठोस सबूत आरोप लगाए जाने पर चिंता जताई है।
पूर्व न्यायाधीशों का कहना है कि लगातार संस्थाओं को पक्षपाती या मिलीभगत करने वाला बताने से लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है। पत्र में यह भी कहा गया कि संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें बदनाम करने से बचना चाहिए।
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की जांच और उसे अपडेट करना है, ताकि मृत, स्थानांतरित, दोहरे या अपात्र मतदाताओं के नामों की पहचान की जा सके। विपक्ष का कहना है कि इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम भी हटने का खतरा है और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है।
वहीं, चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करना जरूरी है। आयोग और बीजेपी ने विपक्ष की ओर से लगाए गए वोट चोरी के आरोपों को खारिज किया है।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR के विरोध में दिल्ली के अलावा बेंगलुरु समेत अन्य जगहों पर भी प्रदर्शन हुए। बेंगलुरु में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में अभिनेता प्रकाश राज और यूट्यूबर ध्रुव राठी भी दिखाई दिए। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठाई।
वहीं, दिल्ली में विपक्षी सांसदों और पुलिस के बीच टकराव तथा कुछ नेताओं के खिलाफ दर्ज एफआईआर ने विवाद को और बढ़ा दिया है।
एक तरफ विपक्ष मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की जांच और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहा है, तो दूसरी तरफ पूर्व न्यायाधीशों ने संवैधानिक संस्थाओं पर बिना प्रमाण आरोप लगाने के खिलाफ चेतावनी दी है।
अब इस विवाद का केंद्र मतदाता सूची में संशोधन की पारदर्शिता, पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा और चुनाव आयोग की जवाबदेही बना हुआ है।