अमेरिका को फिर से महान बनाने के नारे के साथ राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप फिलहाल लास एंजिलिस को हिंसा से बचाने के लिए जूझ रहे हैं। यह हिंसा इसलिए भड़की, क्योंकि ट्रंप अवैध आप्रवासियों के खिलाफ सख्त अभियान छेड़े हुए हैं। लास एंजिलिस में अवैध आप्रवासी और उनके हमदर्द संगठन ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतर आए और उन्होंने इमिग्रेशन एंड कस्टम्स इनफोर्समेंट (आइसीई) को निशाना बनाना शुरू कर दिया।
नतीजा बेकाबू हिंसा के रूप में सामने आया। ट्रंप अवैध आप्रवासियों के खिलाफ इसलिए सख्ती बरत रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे ही मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) समर्थक खुश होंगे। अवैध आप्रवासियों को निकालने में हर्ज नहीं, लेकिन उस तरह नहीं, जैसे ट्रंप निकाल रहे हैं, क्योंकि भारतीय छात्रों समेत वैध तरीके से अमेरिका गए अन्य देशों के लोग भी आइसीई की की सख्ती की चपेट में आ रहे हैं। पता नहीं ट्रंप अवैध आप्रवासियों को निकाल कर अमेरिका को महान बना पाएंगे या नहीं, लेकिन भारत को उनसे सतर्क हो जाना चाहिए। केवल इसलिए नहीं, क्योंकि वह वैध आप्रवासियों को भी तंग कर रहे हैं। भारत को इसलिए भी चिंतित होना चाहिए कि ट्रंप ने पाकिस्तान को एक तरह से गोद ले लिया है। इसकी पुष्टि पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के विरुद्ध भारत की सैन्य कार्रवाई पर उनके अजीब रवैये से हुई थी। वह व्यापार का लालच देकर इस सैन्य संघर्ष को थामने का श्रेय लेने से बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसा करते हुए वह पाकिस्तान का गुणगान करना भी नहीं भूल रहे हैं।
ट्रंप की मानें तो पाकिस्तान ग्रेट नेशन है और वहां के लोगों ने कुछ शानदार चीजें बनाई हैं। दुनिया तो यही मानती है कि पाकिस्तान आतंकियों की फैक्ट्री है। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप भी ऐसा ही मानते थे और उसे धोखेबाज, अमेरिका को मूर्ख बनाकर पैसे ऐंठने एवं आतंकियों को पालने वाला कहते थे, लेकिन दूसरे कार्यकाल में वह उसके मुरीद बन गए। उनकी ओर से पाकिस्तान की तारीफ के पुल बांधने के पीछे उनके बेटों के स्वामित्व वाली क्रिप्टो कंपनी वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल (डब्लूएलएफ) और पाकिस्तान क्रिप्टो काउंसिल (पीसीसी) के बीच हुए समझौते को माना जा रहा है। यह समझौता पहलगाम हमले के पांच दिन बाद 27 अप्रैल को हुआ था, लेकिन इस समझौते के पहले भी कुछ संदेहास्पद हुआ था।
राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद ट्रंप ने जनवरी में अपने भरोसेमंद और अरबपति व्यापारी जेंट्री बीच को निवेशकों के एक दल के साथ पाकिस्तान भेजा। उन्होंने वहां जाकर खनिज संबंधी कुछ समझौते किए और पीएम शाहबाज शरीफ से भी मिले। जेंट्री को ट्रंप का अघोषित विशेष दूत माना जाता है। जेंट्री जब अमेरिका लौटे तो उन्होंने पाकिस्तान की इस कदर तारीफ की कि शायद पाकिस्तानी भी हैरत में बोल पड़े हों कि हमारा देश इतना अच्छा है और हमें ही पता नहीं। लगता है जेंट्री के इस्लामाबाद दौरे के बाद ही ट्रंप को पाकिस्तान को लेकर नई दृष्टि प्राप्त हुई। इसका प्रमाण यह है कि इसी आठ जून को उन्होंने अमेरिका को सुरक्षित रखने के लिए 12 देशों के लोगों पर पूर्ण और सात देशों के नागरिकों पर आंशिक प्रतिबंध लगाया।
इन देशों की सूची में अफगानिस्तान, ईरान, लीबिया, सोमालिया, सूडान, यमन, म्यांमार, चाड, कांगो, क्यूबा, वेनेजुएला, तुर्कमेनिस्तान आदि का नाम तो है, लेकिन पाकिस्तान का नहीं। क्यों नहीं है, इसका जवाब ट्रंप या उनके करीबी ही दे सकते हैं। माना जाता है कि कुछ रिपलिब्कन सांसदों समेत ट्रंप के करीबियों को रिझाने और उनमें से एक जेंट्री बीच को पाकिस्तान ले जाने औऱ डब्लूएलएफ एवं पीसीसी में आनन-फानन समझौता कराने के पीछे वाशिंगटन स्थित पाकिस्तानी दूतावास और उसके लिए लाबिंग करने वालों का हाथ है। यह ध्यान रहे कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका गए थे, तब दोनों देशों की ओर से जारी साझा बयान में आतंकवाद की निंदा की गई थी और मुंबई एवं पठानकोट हमलों के गुनहगारों को न्याय के कठघरे में खड़ा करने तथा इस्लामाबाद से यह सुनिश्चित करने को कहा गया था कि उसकी जमीन का इस्तेमाल किसी तरह की आतंकी गतिविधियों के लिए न होने पाए।
क्या यह विचित्र नहीं कि यही पाकिस्तान अब ट्रंप को अचानक ग्रेट नेशन नजर आने लगा? हम इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकते कि ट्रंप ने अवैध तरीके से अमेरिका गए भारतीयों को किस तरह हथकड़ी-बेड़ी लगाकर भेजा और टैरिफ के मामले में कैसा रवैया अपनाया। उन्होंने भारत में आइफोन बनाने वाली कंपनी एपल को भी चेताया कि वह ऐसा करेगी तो 25 प्रतिशत टैरिफ लगाएंगे। इसके पहले वे हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल पर अधिक टैरिफ का रोना रोते हुए भारत को टैरिफ किंग कह चुके हैं। यह भारत के कथित मित्र देश के शासनाध्यक्ष जैसा व्यवहार तो कतई नहीं है। ट्रंप के दोबारा व्हाइट हाउस पहुंचने के बाद दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत होने की जो उम्मीद की जा रही थी, वह अब दरकती दिख रही है। इसे लेकर मतभेद हैं कि अमेरिका के विदेश मंत्री रहे हेनरी किसिंजर ने वास्तव में कभी ऐसा कहा था- “अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन दोस्त होना जानलेवा होता है”, लेकिन यह सही साबित होता दिख रहा है। दोस्तों को दगा देना अमेरिका की पुरानी आदत है।
बात केवल इतनी ही नहीं कि पाकिस्तान किसी तरह ट्रंप और उनके करीबियों को रिझाने में सफल हो गया। यही काम ट्रंप और उनके करीबी भी कर रहे हैं। पाकिस्तान में अमेरिका की कार्यवाहक राजदूत नताली ए बेकर पीएसएल का फाइनल मुकाबला देखने पहुंचीं। वह लाहौर कलंदर को सपोर्ट कर रही थीं औऱ उसकी शर्ट भी पहने थीं। मैच के पहले भारत के खिलाफ पाकिस्तान सेना की बहादुरी” बयान करने के लिए एक कार्यक्रम रखा गया। इसमें पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारी भी थे औऱ नताली बेकर भी। क्या नताली भी यह जताना चाहती थीं कि पाकिस्ताना सेना ने वाकई भारत पर जीत हासिल की? जो भी हो, इसमें संदेह नहीं कि ट्रंप पाकिस्तान को यह संदेश देने में लगे हुए हैं कि अब उसके प्रति उनका रवैया बदल गया है।
यह तो सबको पता ही है कि हाल में ट्रंप जब पश्चिम एशिया गए तो उन्होंने सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से मुलाकात की। यह वही अल शरा है, जो अलकायदा एवं इस्लामिक स्टेट में रह चुका है और जिस पर अमेरिका ने इनाम रखा था। इसे सुरक्षा परिषद ने वैश्विक आतंकी घोषित किया था। अल शरा उर्फ अबू मोहम्मद अल-जुलानी ने अल-नुसरा फ्रंट नाम से अपना अलग आतंकी गुट बनाया था। फिर इसका नाम हयात तहरीर अल-शाम रखा और कुछ समय पहले राष्ट्रपति बशर अल असद को बेदखल कर सीरिया पर कब्जा करने में सफल रहा।
ट्रंप ने भारत की चिंता बढ़ाने वाला एक और काम किया है। उन्होंने 16 मई को अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के तीन सलाहकार बोर्डों में से एक में दो ऐसे सदस्य बनाए, जिन्हें लेकर विवाद छिड़ा है। ये हैं शेख हमजा यूसुफ और इस्माइल रोयर। दोनों को जिहादी सोच वाला कहा जा रहा है। दोनों मतांतरित मुस्लिम हैं। एक समय एफबीआइ ने हमजा से पूछताछ भी की थी। हमजा से ज्यादा गंभीर मामला रैंडल टाड रोयर उर्फ इस्माइल रोयर का है। उसने 1992 में इस्लाम अपनाया और फिर पाकिस्तान जाकर लश्कर के ट्रेनिंग कैंपों में जिहाद का प्रशिक्षण लिया। इस दौरान उसने सीमा पार से कश्मीर में सुरक्षा चौकियों पर गोलीबारी भी की।
2004 में उसे लश्कर के इशारे पर ‘वर्जीनिया जिहाद नेटवर्क’ चलाने के आरोप में 20 साल की सजा हुई। 13 साल बाद उसे कथित तौर पर सुधर जाने के कारण रिहा कर दिया गया। अब ट्रंप ने इसी “सुधरे हुए” जिहादी को धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के सलाहकार बोर्ड का सदस्य बना दिया। यह आयोग दुनिया भर के देशों को लेकर यह रिपोर्ट देता है कि वहां धार्मिक स्वतंत्रता की क्या स्थिति है। आखिर भारत ट्रंप पर कैसे भरोसा कर सकता है? आशंका है कि ट्रंप के राष्ट्रपति रहते भारत-अमेरिका संबंध बिगड़ने के साथ क्वाड का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है।